Wednesday, December 1, 2021

उत्तराखंड में घास काटने वाली महिलाओं के लिए योजना

  • राजेश डोबरियाल
  • बीबीसी हिंदी के लिए, देहरादून से

घसियारी

इमेज स्रोत, Rajesh Dobriyal

उत्तराखंड सरकार ने पहाड़ों में पशुपालन करने वाली महिलाओं के सिर से घास का बोझ कम करने के उद्देश्य के साथ ‘मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना’ शुरू की है.

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बीते 30 अक्टूबर को इसकी विधिवत शुरुआत की. उन्होंने प्रदेश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए इसे महत्वपूर्ण बताया और कहा कि इससे महिलाओं को काफी राहत मिलेगी.

हालांकि कांग्रेस योजना के नाम का विरोध कर रही है. पहाड़ की महिलाओं को इसके सफल होने पर संदेह है और सामाजिक कार्यकर्ता कह रहे हैं कि यह किसानों को उपभोक्ता और मज़दूर बनाने की साज़िश का हिस्सा है.

क्या है योजना

मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना की आधिकारिक शुरुआत के समय जारी दस्तावेज़ के अनुसार उत्तराखंड में 70 फ़ीसदी से अधिक आबादी की आजीविका कृषि एवं पशुपालन पर आधारित है.

एक अध्ययन के अनुसार चारा काटने के लिए महिलाओं को आठ से 10 घण्टे पैदल चलना पड़ता है. ऐसा माना गया कि इस योजना से पहाड़ी क्षेत्र में महिलाओं के सिर का बोझ कम होगा.

दस्तावेज़ के अनुसार पशुओं को पौष्टिक चारा मिलने से दूध उत्पादन 15 से 20 फीसदी बढ़ जाता है. योजना के तहत पौष्टिक चारे के लिए मक्के का साइलेज (पशुआहार) बनाया जा रहा है. साइलेज की किट 25 किलो की है जो 75 फ़ीसदी सब्सिडी के साथ 50 रुपये में दी जाएगी.

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साइलेज उत्पादन और विपणन संघ लिमिटेड इस योजना का क्रियान्वयन कर रहा है. इसके एमडी आनंद शुक्ला ने बीबीसी हिंदी को बताया, “सहकारिता विभाग के तहत कई उत्पादों की सामूहिक खेती की जा रही है. साल 18-19 में 500 एकड़ में मक्के की सामूहिक खेती शुरू करवाई गई थी, जो अब बढ़कर 2000 एकड़ तक हो गई है.”

इसके बाद एक संघ ने एक कॉर्पोरेट पार्टनर के साथ मिलकर इसे मेज़लेज़ (मक्के का चारा) में कन्वर्ट करना शुरू किया. शुक्ला बताते हैं कि पहले दो साल के लिए डेयरी विभाग से अनुबंध हुआ. सहकारिता संघ से जुड़े किसान इस मक्के का उत्पादन करते थे और दुग्ध सहकारी संघों से जुड़े किसान उस साइलेज (पशुआहार) को लेते थे. इस पर 50 फ़ीसदी अनुदान दिया जाता था.

इस योजना की सफलता से उत्साहित होकर इसे पहाड़ी ज़िलों के लिए शुरू करने का प्रस्ताव तैयार किया गया जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हरी झंडी भी दे दी. योजना के तहत एक लाख महिला किसानों तक पहुंचने का लक्ष्य है. इसके पहले चरण में गढ़वाल से पौड़ी और रुद्रयाग, कुमाऊं से अल्मोड़ा और चंपावत ज़िलों का चयन किया गया है.

शुक्ला बताते हैं कि मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने साइलेज के पैकेट पर सब्सिडी को 50 फ़ीसदी से बढ़ाकर 75 फ़ीसदी कर दिया.

इस योजना के तहत 25 किलो साइलेज का पैकेट जो दो रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से किसानों को दिया जाना है उसकी लागत विभाग को आठ रुपये प्रति किलो पड़ती है. इन्हें चुने हुए चार ज़िलों में खोले गए 50 केंद्रों के माध्यम से बेचा जाएगा.

क्या कहते हैं किसान

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रुद्रप्रयाग की दर्शनी बर्तवाल की उम्र 64 साल है. उनके बच्चे रोज़गार के लिए रुद्रप्रयाग से बाहर रहते हैं और वो अकेली ही खेती करती हैं और एक गाय भी पालती हैं जिसकी एक बछिया और बछड़ा है. उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया कि उन्होंने इस योजना के बारे में सुना तो है लेकिन अभी तक उन्हें कहीं ये सस्ती घास (साइलेज) दिखी नहीं है.

उन्होंने यह भी बताया कि वह 600 रुपये की 25 किलो साइलेज लाती हैं. ये एक-डेढ़ महीने तक चलती है क्योंकि वह उसके साथ ही जंगल से लाई जाने वाली घास और दूसरी चीज़ें भी गाय को देती हैं. दर्शनी बर्तवाल कहती हैं कि अगर 50 रुपये में 25 किलो घास (साइलेज) मिल जाए तो वह गाय को यही ज़्यादा देंगी.

पिथौरागढ़ की गंगोलीहाट तहसील की टुंडाचौड़ा गांव की प्रधान हैं मनीषा बिष्ट. उन्होंने भी इस योजना के बारे में सुना तो है लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह पहाड़ के लिए फ़ायदेमंद होगी, वह कहती हैं कि यह मैदानी क्षेत्रों के लिए ही ठीक होगी.

वह कहती हैं कि सरकार की यह बात सही नहीं है कि मक्के वाली घास ही पौष्टिक होगी क्योंकि मक्का, भट, अनाज का भूसा, भीमल तो यहां भी होते हैं. पशुओं के लिए इनसे बहुत अच्छा चारा बनता है. फिर इन सबमें पड़ने वाली खाद भी नैचुरल ही होती है, बाज़ार का क्या पता.

वह यह भी बताती हैं कि उनके गांव में जो भी सार्वजनिक ज़मीन है वह सभी परिवारों में बांट दी गई है जिस पर होने वाली घास पर उस परिवार का अधिकार होता है. कई परिवार जो अब पशुपालन नहीं करते वह अपनी घास के अधिकार पशुपालकों को दे देते हैं. ऐसे में कौन जाएगा घास खरीदने के लिए?

राजनीतिक विरोध

राज्य के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस योजना को राज्य की महिला शक्ति का अपमान करार दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि प्रदेश की महिलाएं अपने घर में तमाम कामों के साथ ही खेत में काम करती हैं, लेकिन महिलाओं के कामों के आधार पर उनका संबोधन नहीं दिया जाता.

उन्होंने कहा कि हमारे प्रदेश की माताओं और बहनों की तुलना तीलू रौतेली, जिया रानी, गौरा देवी से की जाती लेकिन भाजपा हमारी पहचान ‘घसियारी’ की बनाना चाहती है. यह पहचान बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है.

वीडियो कैप्शन,

उत्तराखंड पर एक और बड़ी तबाही का मंडराता ख़तरा

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि भाजपा शासनकाल में अब मनुष्य ही नहीं बल्कि मवेशी भी कष्ट में आने वाले हैं. प्रदेश की भाजपा सरकार इस योजना के माध्यम से हमारे पहाड़ों की बेटियों और बहनों के हाथों से क़लम की ताक़त को छीनकर वापस उनके हाथ में दराती पकड़ाना चाह रही है.

गढ़वाल और कुमाऊं में घास काटने वाली महिलाओं को ‘घस्यारी’ कहा जाता है. तो सवाल यह है कि कांग्रेस को नाम पर आपत्ति है या योजना पर?

कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना बीबीसी हिंदी के इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि दोनों पर. वह कहते हैं कि अगर आप महिलाओं के सिर से घास का बोझ हटाना चाहते हैं तो योजना का नाम तो सम्मानजनक रखें. फिर डर सरकार की मंशा को लेकर भी है.

धस्माना कहते हैं कि सरकार ने उज्जवला योजना के तहत मुफ़्त सिलेंडर तो दे दिए लेकिन उसके बाद गैस सिलेंडर कर दिया हज़ार रुपये का. ऐसा ही भाजपा सरकार घास के साथ भी करेगी. अभी वह दो रुपये किलो घास दे रही है, फिर तीन करेगी, उसके बाद 30 और फिर 50-100. भाजपा सरकार पहाड़ों में मुफ़्त मिलने वाली घास पर भी कब्ज़ा कर लेगी.

सम्मान देने वाली घस्यारी योजना

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पहाड़ में एक घस्यारी योजना पहले भी शुरू हुई थी. सामाजिक कार्यकर्ता त्रेपन सिंह चौहान ने अपने साथियों के साथ चेतना आंदोलन के तहत यह घस्यारी योजना शुरू की थी. इस योजना के तहत घास काटने और पूली (गट्ठर) बांधने की प्रतियोगिता करवाई जाती थी. जीतने वाली महिलाओं को सम्मानित किया जाता था.

इस योजना को शुरू करने वालों में शंकर गोपाल कृष्णन भी थे. उनका मानना है कि सरकार की घस्यारी योजना से न महिलाओं का कल्याण होने वाला है, और न ही घसियारियों को इज़्ज़त मिलने वाली है. वह कहते हैं कि घस्यारी पहाड़ों की बेस्ट इकोलोजिस्ट हैं. शताब्दियों से उन्हीं की मेहनत से पहाड़ों के जंगल और नदियां बच पाए हैं, जिनके आधार पार आज पूरा उत्तर भारत जी रहा है.

वीडियो कैप्शन,

उत्तराखंड क्या तबाही के ढेर पर बैठा है?

अंग्रेज़ों के ज़माने से पहाड़ी समुदाय के हक़ हुकूकों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया. जल, जंगल और ज़मीन पर पहले नौकरशाही और उसके बाद बड़े कॉर्पोरेट का राज बन गया है.

वह कहते हैं कि चेतना आंदोलन के बहुत साथियों ने जायज़ सवाल उठाया है कि अगर दुकानों से घास बेची जाएगी तो वह घास कहां से आएगी? क्या इस योजना द्वारा सरकार घसियारियों को अपना ही जंगलों के अंदर मज़दूर बनाना चाह रही है? क्या जैसे रेत, लकड़ी, इत्यादि के साथ किया गया है, सरकार अब घास को भी बड़े ठेकेदारों के हाथों में देना चाह रही है?

पत्रकार और एक्टिविस्ट त्रिलोचन भट्ट कहते हैं, “अभी तक मेरी समझ में जो आया है, वह यह है कि घास पर किसी सेठ का अधिकार होगा. महिलाएं अपने ही खेत और अपने ही जंगल में सेठ लिए मज़दूरी करेंगी और फिर अपनी ही काटी हुई घास खरीद कर अपने पशुओं को खिलाएंगी.”

“दरअसल भू-कानून के बाद घस्यारी योजना इसी कांसेप्ट से जुड़ी हुई है. आम लोगों के पास जल, जंगल, ज़मीन की जो थोड़े-बहुत अधिकार अब भी हैं, उन्हें सेठों को थमा दो और आम लोगों को मज़दूर और उपभोक्ता बना डालो.”

Alex V Dare

Alex V Dare

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