Wednesday, December 1, 2021

पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने के आरोप में आगरा में गिरफ़्तार कश्मीरी छात्रों का मामला कहाँ तक पहुँचा?

  • अनंत झणाणे
  • बीबीसी हिंदी के लिए

भारत-पाकिस्तान टी20 वर्ल्ड कप मैच

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भारत-पाकिस्तान टी20 वर्ल्ड कप मैच

उत्तर प्रदेश के आगरा में बीती 24 अक्टूबर को पाकिस्तान से भारत की हार का जश्न मनाने के आरोप में गिरफ़्तार तीन कश्मीरी छात्रों को अभी तक ज़मानत नहीं मिल पाई है.

इनकी गिरफ़्तारी के बाद ख़ुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करके कहा था, “पाक की जीत का जश्न मनाने वालों पर देशद्रोह लगेगा.”

गिरफ़्तार छात्र आगरा के राजा बलवंत सिंह (आरबीएस) इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र हैं. अर्शद यूसुफ़ और इनायत अल्ताफ़ शेख़ इंजीनियरिंग के तीसरे साल के छात्र हैं और शौकत अहमद ग़नी चौथे साल के छात्र हैं.

तीनों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 153A, 505(1)(b) और आईटी एक्ट, 2008 की धारा 66F के तहत मामला दर्ज किया गया. एफ़आईआर में कहा गया है कि इन तीनों ने देश विरोधी नारे लगाए और अराजकता फैलाने की कोशिश की, जिससे माहौल ख़राब होने की आशंका पैदा हुई.

मुख्यमंत्री के ट्वीट के बाद उनके ख़िलाफ़ देशद्रोह की कारवाई की जा रही है.

क्या है पूरा मामला

यूएई और ओमान में खेले जा रहे टी-20 वर्ल्ड कप के एक मैच में में पाकिस्तान ने भारत को दस विकट से हरा दिया था. इन छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान की जीत की ख़ुशी में व्हाट्सऐप पर “लव यू बाबर” और “इंडिया इज़ नॉट माइ कंट्री, माइ कंट्री इज़ कश्मीर” जैसे संदेश लिखे. इन चैट के स्क्रीनशॉट जब वायरल हुए तो कॉलेज प्रशासन ने इन तीनों छात्रों को 25 अक्टूबर को निलंबित कर दिया.

रिपोर्टों के मुताबिक जब ये ख़बर फैली तो भारतीय जनता युवा मोर्चा के लोग कॉलेज कैंपस में आ गए और वहां मौजूद पुलिस से तीनों छात्रों की गिरफ़्तारी की माँग की.

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गौरव राजावत, भाजपा युवा मोर्चा, आगरा

मोर्चा के मंडल अध्यक्ष गौरव राजावत का यह भी आरोप है कि उन्हें दूसरे छात्रों से जानकारी मिली, “पाकिस्तान के मैच के तत्काल बाद, पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए और कहा कि इंडिया इज़ नॉट माइ कंट्री, माइ कंट्री इज़ कश्मीर. यह बहुत ही अशोभनीय है, क्योंकि जो व्यक्ति शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया है, वो हमारे देश को तोड़ने की बात करता है तो उसके लिए हमारे देश में, हमारे प्रदेश में, हमारे आगरा में कहीं भी कोई स्थान नहीं है.”

27 अक्टूबर की रात को पुलिस ने अर्शद यूसुफ़, इनायत अल्ताफ़ शेख़ और शौकत अहमद ग़नी को गिरफ़्तार किया. आगरा के कुछ वकीलों ने इस बात का एलान किया था कि बार का कोई भी वकील इन तीनों छात्रों की पैरवी नहीं करेगा.

आगरा में युवा अधिवक्ता संघ के मंडल अध्यक्ष नितिन वर्मा कहते हैं, “सबकी सहमति से यह निर्णय लिया गया था कि हम कश्मीरी छात्रों की सहायता विधिक रूप से नहीं करेंगे क्योंकि उन्होंने हिन्दुस्तान में रह कर हिंदुस्तान विरोधी कार्य किया है.”

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“बच्चों को माफ़ कर दो”

स्कॉलरशिप के साथ पढ़ रहे छात्रों के परिजन कह रहे हैं, “बच्चों को माफ़ कर दो.”

अपने बेटों की गिरफ़्तारी की ख़बर मिलने के बाद परेशान घर वालों ने आगरा पहुँच कर अपने बच्चों की ख़ैर ख़बर ली. यहां इन तीनों के परिजन ने अपने बच्चों से मुलाक़ात दो और तीन नवंबर को की.

इंजीनियरिंग के चौथे साल के छात्र 22 साल के शौकत अहमद ग़नी के 58 साल के पिता शाबान के तीन और बच्चे हैं. शाबान मनरेगा के मज़दूर हैं और उनकी और उनके एक और बेटे की मज़दूरी की आमदनी से कश्मीर के बांदीपुर में रहने वाला यह परिवार पलता है.

शौकत के पिता कहते हैं कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा है कि उनके बेटे पर ऐसे भड़काउ बयान लिखने का आरोप लग सकता है.

आगरा में शौकत से मुलाक़ात के बारे में शाबान कहते हैं, “मैं आगरा आया था और बच्चे से मुलाक़ात हुई. वे कहते हैं कि मैंने कुछ नहीं किया और मैं बेक़सूर हूँ. मेरे बेटे ने यह भी कहा कि मेरा व्हाट्सऐप चेक करो, या वहां का सीसीटीवी फ़ुटेज चेक करो. बेटा मुझे कह रहा था कि उसने ऐसा कुछ नहीं लिखा.”

लेकिन अब यह मामला काफ़ी बढ़ चुका है, और शायद इस बात का एहसास शाबान को भी है.

वे कहते हैं, “हम बोलते हैं कि अगर उनकी कोई ग़लती भी हुई है, तो उनको माफ़ किया जाए. उनके करियर में कोई दाग़ नहीं लगना चाहिए. उम्मीद है कि योगी साहब उन्हें माफ़ करेंगे. हमारे गांव शाहगुंड के सभी लोगों को दुख पहुँचा है.”

पीएम स्कॉलरशिप के लाभार्थी हैं शौकत

शाबान अपनी आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए बताते हैं कि उनका बेटा शौकत प्रधानमंत्री स्कॉलरशिप स्कीम का लाभार्थी है.

वह कहते हैं, “अगर हम ख़र्चा दे सकते थे तो हम बच्चों को स्कॉलरशिप पर पढ़ने क्यों भेजते. हम इतने ग़रीब हैं कि हम फ़ीस भी नहीं दे पाते हैं. हम ख़ुद मनरेगा में मज़दूरी करते हैं. रोड बिछाते हैं, गिट्टी उठाते हैं. एक और लड़का है वो भी मज़दूरी करता है. बस एक यही बच्चा है, जो उम्मीद है.”

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छात्र इनायत के पिता मोहम्मद अल्ताफ़ शेख़

21 साल के इनायत अल्ताफ़ शेख़ के पिता मोहम्मद अल्ताफ़ शेख़ बड़गाम में बढ़ई का काम करते हैं.

अपने बेटे के बारे में अल्ताफ़ कहते हैं, “वो तीन साल से आगरा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. अगर उसे कुछ ग़लत करना था तो वो आगरा क्या करने गया था. वो तो सिर्फ़ पढ़ने गया था. पता नहीं उन्होंने क्या इलज़ाम लगा दिया उस पर.”

इनायत के पिता को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं. वो पैर में चोट लगने से ख़ुद इनायत से मिलने आगरा नहीं जा सके. उन्हें भरोसा है कि इनायत को अदालत से ज़मानत मिल जाएगी.

प्रधानमंत्री से अपने बेटे के लिए मदद माँगते हुए मोहम्मद अल्ताफ़ शेख़ कहते हैं, “यह तो अपना मुल्क है, इन बच्चों को माफ़ करना चाहिए. यह दूसरे मुल्क में नहीं पल रहे हैं. अगर इनसे क्रिकेट के बारे में कोई ग़लती हो चुकी है तो प्राइम मिनिस्टर साहब को उनको माफ़ करना चाहिए.”

“हम तो सिर्फ़ गुज़ारिश कर सकते हैं. सब बोलते हैं कि इन बच्चों को इस बार तो माफ़ करो. आज बच्चों को पता चल गया कि अब चाहे क्रिकेट हो या कुछ भी हो, अब तो यह क़ानून बन गया, अब कोई बच्चा ऐसी ग़लती नहीं करेगा.”

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अर्शद की माँ हनीफ़ा खेत में मज़दूरी करती हैं

थर्ड यीयर के सिविल इंजीनियरिंग के छात्र अर्शद यूसुफ के पिता 2000 में एक दुर्घटना में गुज़र गए थे. अर्शद की माँ हनीफ़ा खेत में मज़दूरी करती हैं. बड़गाम की रहने वाली हनीफ़ा को बेटे अर्शद के अलावा दो और बेटियां हैं.

अर्शद से जेल में मिलने पहुँचे उनके मामा लतीफ़ अहमद ने बताया, “उसने हमें कहा कि हमने तो ऐसा कुछ नहीं किया. फ्रेंड के साथ चैट कर रहा था और फ्रेंड ने उसका मैसेज फ़ॉरवर्ड कर दिया. उसकी बात का स्क्रीनशॉट अपलोड हो गया था.”

“उनके करियर का सवाल है, और हम लोग सिर्फ़ उनकी रिहाई चाहते हैं. हम हाथ जोड़ कर पीएम साहब से और सीएम योगी जी से गुज़ारिश करते हैं, इनके करियर का ख्याल रखिए और इनको रिहा करिए. हम लोग बहुत परेशान हैं.”

ज़मानत मिलने में हो सकती है मुश्किल

आगरा में वकीलों के बहिष्कार के बाद, तीनों छात्रों की मुश्किलें बढ़ गयी थीं हालाँकि अब उनकी पैरवी करने के लिए आगरा से सटे हुए मथुरा के वकील मधुवन दत्त चतुर्वेदी को वकालतनामा मिला है.

बीबीसी से मधुवन दत्त ने कहा, “निचली अदालत में ज़मानत अर्ज़ी दाख़िल करने वाली जो बात है, अभी उसे हमने टाला हुआ है. जिस तरह से आगरा के बार एसोसिएशन ने वहां प्रस्ताव पास किया कि हम इनके मामलों को नहीं देखेंगे, और लड़कों के साथ भीड़ ने अदालत में धक्का मुक्की की, उससे आगरा में वो हालात नहीं हैं कि हम शांतिपूर्ण तरीक़े से और आज़ादी से अपनी बात कह पाएंगे. कुछ औपचारिकताएँ भी बाक़ी हैं जैसी एफ़िडेविट तैयार होने हैं.”

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मधुवन दत्त चतुर्वेदी, कश्मीरी छात्रों के वकील

तीनों छात्रों ने ख़ुद वकालतनामे पर दस्तख़त कर मधुवन चतुर्वेदी को अपना वकील नियुक्त किया है.

ज़मानत मिलने की सम्भावना के बारे में मधुवन चतुर्वेदी कहते हैं, “मेरिट के आधार पर तो यह केस ज़मानत का है. व्यवहार में क्या होता है, मैं कुछ नहीं कह सकता, सिवाए इस उम्मीद की कि अदालत सरकार के दबाव में काम नहीं करती है, ऐसा हमारा विश्वास है. और उम्मीद तो रहेगी कि न्यायपालिका विश्वास को बनाये रखे. हम लोग आगरा में अपने सहयोग के लिए वकीलों को तलाश रहे हैं. जो वहां हमें सहायता दे सकें. उसमें एक दो दिन का वक़्त और लगेगा और जल्द ही हम आवेदन दाख़िल करेंगे.”

छात्रों के परिवारवालों ने भी वकील मधुवन चतुर्वेदी से मुलाक़ात कर उन्हें बताया है कि बच्चों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और कोई आपत्तिजनक ताल्लुक़ात भी नहीं हैं.

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जिन परिस्थितियों में इन छात्रों की गिरफ़्तारी हुई और कोर्ट के सामने रिमांड के लिए पेशी हुई, उसके बारे में उनके वकील ने बताया, “जब इन्हें पहली बार रिमांड के लिए लाया गया था, तो इन बच्चों के साथ कोई वकील नहीं था जो इनकी रिमांड पर बहस करता, न ही उन्हें एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) ही मिला, जो देना कोर्ट की ज़िम्मेदारी थी. कोर्ट की ज़िम्मेदारी है उन बच्चों से पूछना कि उनके पास कोई वकील है या नहीं. अगर नहीं है तो क्या आपको सरकार की तरफ़ से वकील की ज़रूरत है या नहीं. ऐसा कोई सवाल बच्चों से पूछा नहीं गया.”

वे कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट तो कहता है कि केवल एफ़आईआर दर्ज होना ही किसी की गिरफ़्तारी की वजह नहीं हो सकती. तब तक जब तक आपने कोई ठोस सबूत नहीं बरामद कर लिया हो. और उस दिन तक ऐसा कौन सा सबूत उन्होंने इकठ्ठा कर लिया था कि उन्हें गिरफ़्तार करने की ज़रूरत पड़ गई, हम नहीं कह सकते? अब अगली रिमांड पर ही यह बात पता चल पाएगी.”

आगरा के वरिष्ठ वकील अमीर अहमद का कहना है कि बहिष्कार सिर्फ़ भाजपा से जुड़े हुए वकीलों का है, और वो मामले की पैरवी करने में मधुवन चतुर्वेदी की पूरी मदद करेंगे.

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अमीर अहमद, वरिष्ठ एडवोकेट, आगरा

मामले के राजनीतिक रंग लेने पर अमीर अहमद कहते हैं, “मुझे नहीं लगता है कि आसानी से बेल हो पाएगी. पहले उन पर देशद्रोह नहीं था. मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर दिया कि इन पर राष्ट्रद्रोह की धारा लगाई जाएगी फिर पुलिस ने उसको तुरंत जोड़ दिया. एफ़आईआर में वो सेक्शन नहीं है. 124 ए यानी राष्ट्रद्रोह की धारा एफ़आईआर में नहीं है, लेकिन बाद में पुलिस ने उसको भी जोड़ दिया. पुलिस तो बिल्कुल जो शासन चाहता है, वही कर रही है. तो मुझे नहीं लगता है कि इतनी आसानी से बेल होगी लेकिन हम लोग क़ानूनी दलीलें देंगे, और कोशिश करेंगे कि इनकी बेल हो जाए.”

खेल में किसी दूसरे मुल्क की टीम का समर्थन करने के आरोप को क़ानूनी तौर पर कमज़ोर बताते हुए अमीर अहमद कहते हैं, “किसी टीम को सपोर्ट करना कोई अपराध नहीं है. उन्होंने कहा ‘नारे लगे’, नारे का तो कोई सबूत ही नहीं है. नारेबाज़ी तो हुई ही नहीं है. देश विरोधी नारे लगा दिए, पाकिस्तान ज़िंदाबाद कह दिया, ऐसा तो कोई सबूत है ही नहीं. और इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर ने बाक़ायदा प्रेस वार्ता करके ऐसा कहा था. ऐसा कुछ नहीं हुआ है. सिर्फ़ एक व्हाट्सऐप चैट थी.”

क्या है कॉलेज प्रशासन का कहना

मामले से हड़कंप मचने के बाद राजा बलवंत सिंह (आरबीएस) इंजीनियरिंग कॉलेज प्रशासन ने 24 तारीख़ को पाकिस्तान के पक्ष में व्हाट्सऐप स्टेटस डालने को अनुशासनहीनता बताते हुए अर्शद, इनायत और शौकत को सस्पेंड कर दिया.

आरबीएस कॉलेज के बीछपुर कैंपस के डीन डॉ अपूर्व बिहारी लाल का कहना है, “हमारे सामने सिर्फ़ स्क्रीनशॉट्स वायरल होने का मामला आया था और जब उसके बारे में छात्रों से पूछा गया था तो उन्होंने माना उनसे ग़लती हुई. उसका संज्ञान लेते हुए उन्हें सस्पेंड किया गया. एफ़आईआर में नारेबाज़ी के ज़िक्र के बारे में हमें नहीं मालूम क्योंकि हमने एफ़आईआर नहीं देखी. लेकिन पाकिस्तान की जीत के जश्न वाला व्हाट्सऐप स्टेटस हमने सही पाया.”

आगरा ज़िला के सरकारी वकील बसंत गुप्ता के मुताबिक़ इस मामले में पुलिस ने जाँच में काफी साक्ष्य इकठ्ठा किए हैं. उन्होंने कहा कि वे छात्रों को ज़मानत दिए जाने का विरोध करेंगे.

बसंत गुप्ता कहते हैं, “बेल की अर्ज़ी निचली अदालत के पास आएगी. इनका अपराध देश विरोधी है, दूसरे देश की प्रशंसा देश विरोधी है, और वो उन्होंने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस में लगाए हैं. और व्हाट्सऐप चैट भी है. तो इस मामले में किसी ओरल एविडेंस की ज़रूरत नहीं है. यहाँ पर डॉक्यूमेंट्री एविडेंस काफ़ी है. और सभी सबूत उनके मोबाइल से बरामद हुए हैं. वो उसको मना नहीं कर सकते हैं. बेल की बहस में कोर्ट यही एविडेंस देखेगा और इसी के आधार पर हम इनके ज़मानत का विरोध करेंगे.”

(आगरा से नसीम अहमद के इनपुट के साथ)

Alex V Dare

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