Wednesday, December 1, 2021

पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत में लगी आग, भारत में कैसा है इलेक्ट्रिक गाड़ियों का भविष्य?

  • ज़ुबैर अहमद
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

इलेक्ट्रिक गाड़ियां

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नोएडा के रहने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मनु अग्रवाल ने मार्च में अपनी पेट्रोल की गाड़ी बेच कर एक इलेक्ट्रिक कार ख़रीदी थी. वो अपने इस फ़ैसले से बहुत ख़ुश नज़र आते हैं.

अपनी टाटा नेक्सॉन की इलेक्ट्रिक कार चलाते हुए वो कहते हैं, “मेरा अनुभव काफ़ी सहज रहा है. एक तो इसमें बिल्कुल आवाज़ नहीं है. कंपन नहीं है, तो थकावट भी कम होती है. गाड़ी के अंदर सिर्फ़ एसी की आवाज़ होती है.”

मनु अग्रवाल ने इलेक्ट्रिक कार क्यों ख़रीदी? वो कहते हैं इसके पीछे कई कारण थे, “मेरा रोज़ का ड्राइव 70-80 किलोमीटर का है, कभी 100 किलोमीटर भी हो जाता है. तो मैं एक किफ़ायती साधन की तलाश में था जिससे कि मेरे ट्रैवल कॉस्ट में कुछ बचत हो क्योंकि पेट्रोल और डीज़ल के दाम तो हमेशा बढ़ते ही रहेंगे, कम नहीं होंगे.”

“दूसरा (कारण) पर्यावरण से जुड़ा है क्योंकि ये गाड़ियां रिन्यूएबल ऊर्जा सोर्सेज से चार्ज हो जाती हैं. इसमें धुआं बिल्कुल नहीं है. तो इलेक्ट्रिक वाहन को एनसीआर के लोग अपनाएंगे तो सर्दियों में होने वाला प्रदूषण काफ़ी हद तक कम हो जायेगा.”

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इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर लोगों के मन में कई सवाल

इलेक्ट्रिक कार ख़रीदने के बारे में सोच रहे ज़्यादातर लोगों के मन में कई तरह के सवाल हैं. उनकी चिंता वाहनों को चार्ज करने को लेकर है, इसकी बैटरी के दाम और वाहनों की क़ीमत को लेकर भी है.

ग्रेटर नॉएडा के निवासी फ़ासिल राही एक इलेक्ट्रिक कार ख़रीदने के बारे में सोच रहे हैं, लेकिन वो दुविधा में हैं. उनका दफ़्तर कनॉट प्लेस में है और उन्हें हर रोज़ 100 किलोमीटर गाड़ी चलानी पड़ती है. वो इलेक्ट्रिक वाहनों के बारे में जितनी जानकारी जुटा सके हैं उसके अनुसार गाड़ी को हर रोज़ चार्ज करना उनके लिए एक मुसीबत है.

इसलिए अभी वो इलेक्ट्रिक कार नहीं ख़रीदना चाहते. वो कहते हैं, “एक तो हर 200 से 250 किलोमीटर के बाद वाहन को चार्ज करना अनिवार्य है, ये मेरे लिए मुश्किल काम होगा. इसके अलावा लंबी यात्रा में इस बात का डर रहेगा कि वाहन को चार्ज करने की ज़रुरत पड़ी तो चार्जिंग पॉइंट्स या चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध होंगे या नहीं?”

लेकिन मनु अग्रवाल इन चिंताओं को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि जब भी कोई नई टेक्नोलॉजी आती है तो लोगों के दिमाग़ में चिंता तो रहती है.

वो कहते हैं, “गाड़ी की बैटरी के लिए दो तरह की चार्जिंग उपलब्ध है -एक धीमी चार्जिंग और एक फ़ास्ट चार्जिंग. कंपनी वाले कहते हैं कि तेज़ चार्जिंग आधे घंटे में 80 प्रतिशत बैटरी चार्ज कर देती है और एक घंटे में पूरा चार्ज कर देती है.

एसी चार्जिंग में आठ घंटे में बैटरी पूरी तरह से चार्ज हो जाती है. कंपनी वाले घर पर ही चार्जिंग सिस्टम लगा कर जाते हैं. ये एक ऐसा चार्जिंग सिस्टम है कि 15 एंपियर के सॉकेट में कहीं भी चार्ज हो सकता है और डीसी चार्जिंग के स्टेशन धीरे-धीरे हर जगह बन रहे हैं.”

वैसे भी जिस तरह से पेट्रोल और डीज़ल वाहनों में आप डैशबोर्ड पर देख सकते हैं कि आपकी गाड़ी में पेट्रोल/डीज़ल कितना बचा है और बिल्कुल कम होने पर वॉर्निंग मिलती है, ठीक उसी तरह से इलेक्ट्रिक कारों में डिजिटल डैशबोर्ड पर आपको साफ़ नज़र आएगा कि बैटरी कितनी बची है और बिल्कुल ख़त्म होने से पहले उसे चार्ज कर लें, ठीक उसी तरह से जैसे गाड़ी में पेट्रोल/डीज़ल ख़त्म होने से पहले आप पेट्रोल पंप पर जाकर अपने वाहन में पट्रोल/डीज़ल भरा लेते हैं.

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बैटरी और चार्जिंग स्टेशनों से जुड़े कई सवाल

चार्जिंग पॉइंट्स और चार्जिंग स्टेशनों की बात करें तो पुणे-स्थि इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और चार्जिंग स्टेशन कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संघ, इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस (IESA) के प्रवक्ता राहुल वालावलकर के अनुसार, इसमें देश भर में विस्तार हो रहा है और अगले डेढ़ या दो सालों में चार्जिंग स्टेशनों का एक पूरा जाल बिछने वाला है. इसमें केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारें और निजी कंपनियां सभी शामिल हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि चार्जिंग पॉइंट्स के बारे में चिंता करने वालों को 1911-13 के दौर का अध्ययन करने की ज़रूरत है जो कारों के शुरुआती साल थे और उस समय आज की तरह पेट्रोल पंप और गैस स्टेशन नहीं थे. इनका विकास धीरे-धीरे हुआ और योजनाबद्ध तरीके से हुआ.

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किस तरह की कारों का आएगा ज़माना

आज भी हम अपने घरों या गराजों में अपनी गाड़ियों में ख़ुद से पेट्रोल नहीं भरते. हमें पेट्रोल पंप जाना ही पड़ता है, चाहे आपका वाहन सीएनजी से चलता हो या डीज़ल या पेट्रोल से. लेकिन जहाँ तक इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्ज करने की बात है तो वो चार्जिंग पॉइंट्स घरों में होंगे, हमारे हाउसिंग सोसाइटीज़ में भी होंगे. कार पार्क और शॉपिंग मॉल्स में भी होंगे. लंबे सफ़र के दौरान आपको बड़े ढाबे मिलते हैं, ये चार्जिंग पॉइंट्स वहां भी लगे होंगे. यानी इस समय देश में जितने पेट्रोल पंप हैं उनसे कहीं अधिक संख्या में चार्जिंग पॉइंट्स उपलब्ध होंगे. भारत सरकार, राज्य सरकारें और निजी कंपनियां इसके विकास पर तेज़ी से काम कर रही हैं.

फ़ासिल राही को इलेक्ट्रिक कार ख़रीदने से ये बात भी रोक रही है कि हर कुछ सालों में वाहन की बैटरी को बदलने की ज़रूरत पड़ेगी. “ये सब एक बड़ी मुसीबत की तरह है. इससे बेहतर है कि मैं एक पेट्रोल कार ही ख़रीद लूँ.”

लेकिन मनु अग्रवाल के अनुसार उन्हें टाटा नेक्सॉन वालों ने बैटरी पर आठ साल की वॉरंटी दी है. उनके अनुसार बैटरी अचानक काम करना बंद कर देगी ऐसा नहीं है. अगर आज फ़ुल चार्ज पर गाड़ी 250 किलोमीटर चलती है तो कुछ सालों बाद फ़ुल चार्ज पर 200 किलोमीटर चलेगी और धीरे-धीरे कम माइलेज देगी. लेकिन अगर आप रोज़ 100 किलोमीटर भी चलाते हैं तो बैटरी बदलने की ज़रूरत नहीं”.

हाँ वो ये बात स्वीकार करते हैं कि एक नई बैटरी महँगी है जिसकी क़ीमत छह लाख से ज़्यादा है. मगर उन्हें उम्मीद है कि इलेक्ट्रिक कारों की लोकप्रियता बढ़ने पर बैटरियों के दाम घटेंगे

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इलेक्ट्रॉनिक वाहन महंगे और इसकी बैटरी भी महँगी

आम तौर पर भारत में लोग इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटर को पेट्रोल/डीज़ल वाले वाहनों से महंगा मानते हैं, लेकिन इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस (IESA) के प्रवक्ता राहुल वालावलकर कहते हैं कि वाहन ख़रीदने के समय पैसे ज़्यादा ज़रूर खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन इसका रनिंग कॉस्ट और मेंटेनेंस पेट्रोल/डीज़ल/सीएनजी वाहनों से कम है.

वो कहते हैं, “इलेक्ट्रिक व्हीकल का रनिंग कॉस्ट एक पारम्परिक वाहन के कॉस्ट से एक चौथाई से अधिक कम है. बहुत से ऐसे कस्टमर हैं जो ये वाहन ख़रीद नहीं सकते. लेकिन आजकल सेल फ़ोन से लेकर हर चीज़ पर आप कस्टमर को किस्तों पर पेमेंट का ऑप्शन देते हैं. केवल इसी की ज़रूरत है. फ़ाइनेंसिंग की समस्या का समाधान करना होगा. फ़ाइनेंशियल और ऑटो कंपनियों को साथ में मिलकर काम करना पड़ेगा.”

मनु अग्रवाल भी इसका गणित समझाते हुए कहते हैं, “बैटरी को चार्ज करने के लिए बिजली का जो ख़र्च आता है उसका कॉस्ट नोएडा में प्रति किलोमीटर लगभग एक रुपये होता है, सीएनजी का तीन रुपये, डीज़ल का लगभग पांच रुपये और पेट्रोल का सात रुपये प्रति किलोमीटर से अधिक. कंपनी के मुताबिक़ मेरी कार की बैटरी की लाइफ़ 1,65,000 किलोमीटर है. तो इस तरह से इसे चार्ज करने का कॉस्ट 1.65 लाख रुपये आएगा जबकि 1,65,000 किलोमीटर पर पेट्रोल का ख़र्च 11 लाख रुपये से अधिक आएगा.”

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भारत में इलेक्ट्रिक स्कूटर और इलेक्ट्रिक रिक्शा का मार्केट अधिक सक्रिय

चीन, अमेरिका और यूरोप की तरह भारत में भी इलेक्ट्रिक वाहन ख़रीदने का सिलसिला शुरू हो चूका है. लेकिन देश में फ़िलहाल इलेक्ट्रिक स्कूटर और ऑटो-रिक्शा की बिक्री और मांग इलेक्ट्रिक कारों की तुलना में कहीं अधिक है. वित्तीय वर्ष 2020-21 में क़रीब 144,000 इलेक्ट्रिक स्कूटर बिके और 88,000 से कुछ ज़्यादा इलेक्ट्रिक ऑटोरिक्शा, जो महामारी के कारण पिछले वित्तीय वर्ष के मुक़ाबले थोड़े कम थे.

राहुल वालावलकर कहते हैं, “हमारा जो विश्लेषण है उसके हिसाब से टू-व्हीलर की संख्या सबसे ज़्यादा रहेगी. अभी हम देख रहे हैं कि ओला, ईथर और हीरो इलेक्ट्रिक तीनों कंपनियां जो मैन्युफ़ैक्चरिंग कपैसिटी लगा रही हैं इससे अगले तीन साल में हर साल दो करोड़ इलेक्ट्रिक व्हीकल बनाए जाएंगे.”

स्वतंत्रती दिवस के दिन कैब कंपनी ओला ने “पेट्रोल और डीज़ल से आज़ादी” दिलाने के लिए बड़े धूम धाम से एक इलेक्ट्रिक स्कूटर लांच किया जिसका नाम ओला एस1 रखा गया है. कंपनी की एक प्रवक्ता ने कहा कि जुलाई में इसके लिए “रजिस्ट्रेशन शुरू होने के 24 घंटे के अंदर ही एक लाख ऑर्डर प्लेस किए गए थे.”

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छोटी गाड़ियां बनाने वाला कलाकार

ओला एस 1 की क़ीमत एक लाख रुपये है और एस1 प्रो का दाम इससे 30,000 रुपये अधिक. इसकी स्पीड 90 किलोमीटर तक है और कंपनी का दावा है कि इसकी बैटरी फ़ुल चार्ज पर 118 किलोमीटर तक चलेगी. इस स्कूटर में वाईफ़ाई, ब्लूटूथ और वॉइस कमांड इत्यादि जैसे फ़ीचर होंगे. इसमें एक स्पीकर भी लगा है जिससे गाने भी सुने जा सकते हैं.

ओला कंपनी ने इन स्कूटरों की फ़ैक्ट्री तमिलनाडु में लगाई है और कपंनी का दावा है कि ये दुनियाभर में इलेक्ट्रिक स्कूटर बनाने वाली सब से बड़ी फ़ैक्ट्री है. कंपनी के मुताबिक़ इस फ़ैक्ट्री में हर साल दो करोड़ स्कूटर बनाने की योजना है. कंपनी को उम्मीद है कि देश में 2025 से केवल इलेक्ट्रिक स्कूटर ही बिकेंगे.

पिछले हफ़्ते क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंपनी के एक बयान के अनुसार, इसके इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों की बिक्री भी एक लाख को पार कर गई है.

केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रोत्साहन के लिए कई तरह की छूट दे रही हैं. उदाहरण के तौर पर केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों की रजिस्ट्रेशन फ़ीस माफ़ कर दी है. दिल्ली सरकार पहले 1,000 इलेक्ट्रिक कारों के ख़रीदारों को डेढ़ लाख रुपये का डिस्काउंट दे रही है, मगर शर्त ये है कि कार का बेस प्राइस 15 लाख रुपये से कम हो.

दिल्ली सरकार हर महीने बैटरी चार्ज करने के लिए बिजली में 200 यूनिट के पैसे नहीं ले रही है. महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों ने इलेक्ट्रिक वाहन के निर्माताओं को भी कई तरह की छूट दे रही है. इसके कारण निजी कंपनियां कार और स्कूटर बनाने के कारखाने खोल रही हैं. वाहनों के निर्माण सबसे आगे तमिलनाडु है.

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भारत में इलेक्ट्रिक कारों की विकास दर इतनी सुस्त क्यों?

इलेक्ट्रिक कारों की बात करें तो देश भर में 2020-21 वित्तीय वर्ष में केवल 4588 गाड़ियों की ही बिक्री हुई. लेकिन टाटा कंपनी का कहना है कि इसके अगले कुछ सालों में कंपनी में बनी सभी कारों में 25 प्रतिशत इलेक्ट्रिक कारें होंगी. टाटा जल्द ही दो नयी इलेक्ट्रिक कार लांच करने वाला है जिनकी क़ीमत 10 लाख रुपये के क़रीब होगी.

एमजी कार कंपनी ने भी एक इलेक्ट्रिक कार मार्केट में लांच की है जो 23 लाख रुपये से अधिक की है. इसके लाजपत नगर शोरूम के अनुसार, हाल में दिल्ली के मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग ने कंपनी की इलेक्ट्रिक कार ख़रीदी है.

इलेक्ट्रिक कारों की कम मांग की वजह बताते हुए कारों के शोरूम के मालिक कहते हैं कि चार्जिंग को लेकर सवाल और इसके दाम ख़ास कारण हैं. फ़ासिल राही कहते हैं, “मेरा बजट 12 लाख रुपये का है. इस बजट में पेट्रोल/डीज़ल गाड़ियों में कई विकल्प हैं, लेकिन इलेक्ट्रिक कार में एक भी नहीं है. टाटा नेक्सॉन मेरे बजट से 4-5 लाख रुपये ज़्यादा है.”

विकल्प की बात करें तो फ़ासिल राही की बात सही है. टाटा नेक्सॉन की इलेक्ट्रिक कारों के तीन मॉडल्स हैं जिनकी ऑन रोड क़ीमत 14 लाख से 17 लाख रुपये तक है. इससे थोड़ा कम दाम महिंद्रा की इलेक्ट्रिक कार का है, लेकिन लोग इसे अधिक पसंद नहीं कर रहे हैं. ‘हुंडई कोना इलेक्ट्रिक’ भी एक अच्छी इलेक्ट्रिक कार है जिसका दाम 25 लाख रुपये से अधिक है. इसके बाद की इलेक्ट्रिक कारें लक्ज़री ब्रांड्स में हैं जिनके दाम 90 लाख रुपये से सवा करोड़ रुपये तक हैं.

फ़िलहाल ऑटोमोबाइल उद्योग में विश्व के पांचवें सबसे बड़े देश भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल एक उभरता उद्योग है. इस समय ये उस शुरूआती दौर में है जिस में 1990 के दशक के शुरुआती सालों में इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन थे. विशेषज्ञ कहते हैं कि जिस तरह इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन देखते ही देखते हमारे जीवन में छा गए, इलेक्ट्रिक वाहन भी उसी तरह से जल्द ही हमारी ज़िंन्दगी का एक अटूट अंग बन जायेंगे.

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भारत सरकार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य

मोदी सरकार 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों और इसके पूरे इकोसिस्टम को 206 अरब डॉलर का उद्योग बनाना चाहती है जिसके अंतर्गत देश भर में आधे से अधिक वाहन इलेक्ट्रिक होंगे और चार्जिंग स्टेशनों का पूरे देश में एक जाल बिछाने का भी लक्ष्य इसमें शामिल है. इसके अलावा देश में बैटरी की फ़ैक्ट्रियां लगाने वाली कंपनियों को कई तरीक़े की वित्तीय छूट भी दिए जाने की योजना है.

लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 185 अरब डॉलर का निवेश होना ज़रूरी है. मार्केट रिसर्च एजेंसियों के अनुसार भारत में विदेशी निवेश के बग़ैर सरकार अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर सकती. इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी टेस्ला ने भारत में इलेक्ट्रिक कारें सप्लाई करने और एक फ़ैक्ट्री बनाने की बात कही है.

यहाँ तक कि बेंगलुरु में उसने अपना इंडिया ऑफ़िस भी खोल लिया है. लेकिन कंपनी ने मोदी सरकार से आयात शुल्क में भारी कमी करने की मांग की है. सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया है. फ़ोक्सवैगन कार कंपनी 2025 तक टेस्ला के बाद सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक कार कंपनी बनना चाहती है. इस जर्मन कंपनी ने भी मोदी सरकार से आयात शुल्क में कमी करने की मांग की है.

राहुल वालावलकर का कहना है कि थोड़े सालों के लिए विदेशी इलेक्ट्रिक कार कंपनियों को भारत में आने देना चाहिए ताकि निवेश हो सके, लेकिन लंबे समय की योजना में भारतीय कंपनियों का प्रोत्साहन करना चाहिए.

वो कहते हैं, “इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायन्स का ये कहना है कि अगर शॉर्ट टर्म के लिए हम लोग आयात कर में छूट देते हैं, क्योंकि अभी तक इंडिया में भारतीय कार निर्माताओं ने इलेक्ट्रिक कारों में ज़्यादा विकल्प नहीं दिए हैं, तो उसकी वजह से अगर अगले दो या तीन सालों के लिए आयात कर में छूट मिल जाती है जहां पर कस्टमर्स को चॉइस मिलता है और मार्केट में मांग में उछाल आता है, तो ये बहुत अच्छी चीज़ रहेगी.”

2040 तक बिकने वाली हर नयी कार इलेक्ट्रिक होगी

भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल उद्योग की ऊंचाई तक पहुँचने का रास्ता लंबा है, लेकिन जल्द ही रफ़्तार तेज़ होने वाली है. चीन, अमेरिका और यूरोप में पेट्रोल और डीज़ल वाली गाड़ियों की जगह लोग तेज़ी से इलेक्ट्रिक कारें और स्कूटर खरीद रहे हैं और स्थानीय प्रशासन पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ई-बसों को शामिल कर रहे हैं.

पिछले साल विश्व स्तर पर 32 लाख इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री में से 14 लाख कारों के साथ चीन सबसे आगे रहा. अमेरिका दूसरे स्थान पर था, लेकिन बिक्री पांच लाख कारों से भी कम थी.

2020 में इलेक्ट्रिक कारों की वैश्विक बिक्री 43 प्रतिशत बढ़कर 32 लाख हो गई, जबकि कोरोना महामारी के दौरान कारों की कुल बिक्री में काफ़ी गिरावट आयी है. ये फ़िलहाल कुल कार बिक्री का सिर्फ़ 5 प्रतिशत है, लेकिन यह दर्शाता है कि दुनिया भर में भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों का होने जा रहा है.

इन्वेस्टमेंट बैंक यूबीएस की एक हालिया रिपोर्ट के पूर्वानुमान के अनुसार, 2025 तक वैश्विक स्तर पर बिकने वाली सभी नई कारों में से 20% इलेक्ट्रिक होंगी. यूबीएस का कहना है कि 2030 तक यह 40 फ़ीसदी तक पहुंच जाएगा और 2040 तक दुनिया भर में बिकने वाली लगभग हर नई कार इलेक्ट्रिक होगी.

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दुनियाभर की कई कंपनियां उड़ने वाली टैक्सियों के कन्सेप्ट पर काम कर रही हैं.

भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों का ही है

विश्व स्तर पर नज़र डालें तो कई उद्योग पर्यवेक्षकों का मानना है कि ‘हम पहले ही उस महत्वपूर्ण बिंदु को पार कर चुके हैं जहां इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री बहुत तेज़ी से पेट्रोल और डीज़ल कारों पर हावी हो जाएगी’.

ऐसा निश्चित रूप से दुनिया के बड़े कार निर्माता सोचते हैं. महंगी गाड़ियों के सेगमेंट में देखें तो जैगुआर ने 2025 से केवल इलेक्ट्रिक कार बेचने की योजना बनाई है, 2030 से वोल्वो और पिछले हफ्ते ब्रिटिश स्पोर्ट्सकार कंपनी लोटस ने कहा कि वह 2028 से केवल इलेक्ट्रिक मॉडल बेचेगी.

इनसे थोड़ी सस्ती कार बनाने वाली कंपनियों के इरादे भी कुछ ऐसे ही हैं. जनरल मोटर्स का कहना है कि वह 2035 तक केवल इलेक्ट्रिक वाहन बनाएगी, फ़ोर्ड का कहना है कि यूरोप में बेचे जाने वाले सभी वाहन 2030 तक इलेक्ट्रिक होंगे और फ़ोक्सवैगन ने घोषणा की है कि 2030 इसकी बिक्री का 70 प्रतिशत इलेक्ट्रिक गाड़ियों का होगा.

टेस्ला इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है जो 2025 तक फ़ोक्सवैगन को पीछे छोड़ना चाहती है. टेस्ला और फ़ोक्सवैगन अपने इलेक्ट्रिक वाहनों को भारत में बेचना चाहती हैं, लेकिन उनकी भारत सरकार से मांग है कि इन वाहनों पर आयात ड्यूटी कम की जाए जो इस समय 60 प्रतिशत से 100 प्रतिशत है.

मज़े की बात ये है कि सरकारें पेट्रोल और डीज़ल वाहनों पर प्रतिबंध नहीं लगा रही हैं. ये निजी कार निर्माता अपने दम पर पहल कर रहे हैं और इससे इलेक्ट्रिक वाहनों को बड़ा प्रोत्साहन मिल रहा है. नई टेक्नोलॉजी पेट्रोल और डीज़ल वाहनों में इस्तेमाल होने वाले इंजन के अंत को सुनिश्चित कर रही है.

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