Friday, December 3, 2021

सऊदी अरब के क्राऊन प्रिंस का यह लक्ष्य क्या भारत के बिना पूरा होगा?

सऊदी के क्राउन प्रिंस

इमेज स्रोत, SPA

सऊदी अरब ने 2060 तक ज़ीरो-नेट इमिशन का लक्ष्य रखा है. शनिवार को सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी ग्रीन इनिशिएटिव (एसजीआई) के प्रमुख के तौर पर एक पर्यावरण सम्मेलन में इसकी घोषणा की.

क्राउन प्रिंस ने कहा कि सऊदी अरब हर साल 27 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएगा. उन्होंने कहा कि इसके लिए 186.63 अरब डॉलर के निवेश की ज़रूरत होगी.

क्राउन प्रिंस ने कहा कि एसजीआई के तहत पहले चरण में साल 2030 तक हर साल कार्बन उत्सर्जन में 278 मेगा टन की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है. इस साल की शुरुआत के एसजीआई समिट में जो लक्ष्य रखा गया था, उसका यह दोगुना से भी ज़्यादा है.

इसके अलावा, सऊदी अरब ‘वैश्विक मीथेन संकल्प’ में भी शामिल होगा और साल 2030 तक वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में 30 फ़ीसदी तक की कमी लाएगा. सऊदी अरब ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में अगले महीने होने वाले वैश्विक जलवायु सम्मेलन से पहले ये घोषणा की है.

ज़ीरो-नेट इमिशन क्या है?

ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन और वातावरण से ग्रीनहाउस गैस कम करने के बीच के संतुलन को नेट ज़ीरो इमिशन कहते हैं. इसका मतलब, ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन का पैमाना सेट करना है.

अब तक जितनी ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करते आए हैं, उसमें कमी लाने का पैमाना ही नेट ज़ीरो इमिशन है. इसका मतलब यह हुआ कि किसी भी साल में वातावरण से ग्रीनहाउस गैस जितनी कम की गई हो, उसकी तुलना में ज़्यादा उत्सर्जन ना करें. ग्रीनहाउस गैस वैसी गैस होती हैं, जिनसे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है. मसलन कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और फ्लोरिनेटेड गैस को ग्रीनहाउस हाउस गैस की श्रेणी में रखा गया है.

अतीत में ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन से जितना नुक़सान हो चुका है, उसकी भी भरपाई करने की बात हो रही है. जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को रोक कर अगर हम ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन रोक भी दें तो भी इतने सालों में हमने वातावरण में जितना उत्सर्जन किया है, उससे भी निपटने की चुनौती है.

नेट ज़ीरो इमिशन का मतलब ये नहीं है कि ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन बंद हो जाएगा. नेट ज़ीरो इमिशन का मतलब ये है कि हम कुछ मात्रा में ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कर सकते हैं लेकिन उससे ज़्यादा वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैस में कमी लाने के लिए क़दम उठाने होंगे. मिसाल के तौर जंगल बढ़ाने होंगे और जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल रोकना होगा.

सऊदी का लक्ष्य क्या कल्पना है?

हालांकि सऊदी अरब ने कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य अपने लिए तय किया है लेकिन तेल और गैस सेक्टर के निवेश में कोई कमी लाने का संकेत नहीं दिया है. ऊर्जा बाज़ार में जीवाश्म ईंधन की जो हिस्सेदारी है, उससे वो क़दम पीछे नहीं खींचने जा रहा है.

ऊर्जा निर्यात ही सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. सऊदी अरब राजस्व की निर्भरता तेल से कम करने की कोशिश कर रहा है लेकिन ये अब भी दूर की कौड़ी है. इस साल सऊदी ने तेल से 150 अरब डॉलर का राजस्व हासिल करने का अनुमान लगाया है.

क्राउन प्रिंस ने कहा है कि साल 2030 तक सऊदी अरब में 45 करोड़ नए पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है. इसके साथ ही बंजर हुई ज़मीन को भी उर्वर बनाने की कोशिश की जाएगी. लैंडलॉक्ड शहर रियाद को हरा-भरा बनाने का भी लक्ष्य रखा गया है.

सऊदी अरब के अलावा रूस और चीन ने भी 2060 तक ज़ीरो-नेट इमिशन का लक्ष्य रखा है. अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देशों ने साल 2050 तक ये लक्ष्य हासिल करने की बात कही है.

सऊदी अरब दुनिया के बड़े प्रदूषक देशों में से एक है. COP26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने सऊदी की इस घोषणा का स्वागत किया है. आलोक शर्मा ने ट्वीट कर कहा है, ”मुझे उम्मीद है कि सऊदी अरब की इस घोषणा से बाक़ी देश भी प्रेरित होंगे.”

विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब ने इस घोषणा से वैश्विक जलवायु परिवर्तन वार्ता में अपनी जगह सुरक्षित कर ली है लेकिन जीवाश्म ईंधन को लेकर उसका रुख बिल्कुल उलट है. जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को तत्काल रोकने की मांग को लेकर सऊदी अरब कहता रहा है कि अचानक ऐसा करने से महंगाई बढ़ जाएगी और ईंधन की कमी से जूझना पड़ेगा.

लीक दस्तावेज़ के अनुसार, सऊदी समेत अन्य देश COP26 समिट के रुख़ को अपने हिसाब से करने की कोशिश में लगे हैं. एक तरफ़ सऊदी अरब अपने यहाँ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की बात कर रहा है लेकिन दूसरी तरफ़ भारत और चीन को तेल बेचने में कोई कटौती नहीं करना चाहता है.

चीन और भारत में आने वाले सालों में जीवाश्म ईंधन की माँग और बढ़ने वाली है. लेकिन सऊदी अरब जब तक भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातकों से तेल बेचना बंद नहीं करता है तब तक उसके लक्ष्य का वैश्विक तापमान घटाने में कोई असर नहीं होगा.

सऊदी के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुल अज़ीज बिन सलमान ने कहा है, ”सऊदी की आर्थिक वृद्धि दर ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर है. यह कोई राज़ नहीं है.” सऊदी अरब ने कहा है कि वो ज़ीरो-नेट का लक्ष्य कार्बन सर्कुलर इकॉनमी के ज़रिए हासिल करेगा. इसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती, फिर से इस्तेमाल और पुनर्चक्रण की बात कही गई है. हालाँकि पर्यावरण विशेषज्ञ इस फॉर्म्युला को अप्रभावी मानते हैं और कहते हैं कि जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल रोकना ही टिकाऊ उपाय है.

सऊदी ने जिन तरीक़ों से कार्बन उत्सर्जन कम करने की बात कही है, वो बहुत टिकाऊ नहीं माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में सीधे कटौती करने की ज़रूरत है.

विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सीधी कटौती के वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री की कमी लाना संभव नहीं है. सऊदी अरब के पास एक अनुमान के मुताबिक़ 17 फ़ीसदी पुष्ट पेट्रोलियम रिज़र्व है और वैश्विक तेल मांग की 10 फ़ीसदी आपूर्ति करता है.

ऊर्जा बाज़ार और तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक में सऊदी अरब का दबदबा है. कहा जा रहा है कि सऊदी अरब बाक़ी तेल उत्पादक देशों पर दबाव डाल सकता है.

सऊदी अरब ने पिछले साल क़ीमतों को कंट्रोल करने के लिए ऐसा किया था और इसका असर भी दिखा था. सऊदी अरब का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा मार्केट में स्थिरता और सुरक्षा के साथ ही वो कार्बन उत्सर्जन में कटौती का काम करेगा.

खाड़ी के देशों का कहना है कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को रोकने से कम आय वाले देश और वहां की आबादी बुरी तरह से प्रभावित होंगे.

इस महीने की शुरुआत में खाड़ी के एक और बड़ा ऊर्जा उत्पादक देश संयुक्त अरब अमीरात ने 2050 तक नेट-ज़ीरो इमिशन का लक्ष्य रखा था. इस इलाक़े में यूएई एकमात्र देश है, जहाँ परमाणु बिजली संयत्र है. यूएई ने लक्ष्य तो रख दिया है, लेकिन कार्बन का उत्सर्जन कैसे रोकेगा, इसके बारे में कुछ नहीं बताया है.

Alex V Dare

Alex V Dare

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