Wednesday, December 1, 2021

'हिंदुत्व' पर कांग्रेस में राहुल, ख़ुर्शीद और ग़ुलाम नबी के सुर अलग क्यों?

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता

कांग्रेस के तीन बड़े नाम

इमेज स्रोत, Getty Images and AFP

सलमान ख़ुर्शीद ने नई किताब अयोध्या विवाद और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर लिखी है. लेकिन विवाद ‘हिंदुत्व’ पर शुरू हो गया है.

अब इस पूरे विवाद में राहुल गांधी की एंट्री हो गई है.

महाराष्ट्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण शिविर को वर्चुअली संबोधित करते हुए शुक्रवार को उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क़ है. अगर फर्क़ नहीं होता तो नाम एक होता. हिंदू को हिंदुत्व की ज़रूरत नहीं होती?”

उन्होंने आगे कहा, “क्या हिंदू धर्म किसी सिख या मुस्लिम को मारने का नाम है? लेकिन हिंदुत्व है. क्या हिंजू धर्म अख़लाक को मारने के बारे में है? किस किताब में ये लिखा है? मैंने उपनिषद पढ़ा है उसमें नहीं लिखा. किस हिंदू धर्म की किताब में लिखा है कि किसी बेगुनाह को मार सकते हैं? मैंने नहीं पढ़ा है. लेकिन हिंदुत्व में मैं इसे देख सकता हूँ.”

दरअसल सलमान ख़ुर्शीद की नई किताब ‘सनराइज़ ओवर अयोध्या’ हाल ही में बाज़ार में आई है, जिसकी एक लाइन पर विवाद हो रहा है, जिसमें हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और बोको हराम से की गई है.

किताब की एक लाइन में लिखा है.

“भारत के साधु-संत सदियों से जिस सनातन धर्म और मूल हिंदुत्व की बात करते आए हैं, आज उसे कट्टर हिंदुत्व के ज़रिए दरकिनार किया जा रहा है. आज हिंदुत्व का एक ऐसा राजनीतिक संस्करण खड़ा किया जा रहा है, जो इस्लामी जिहादी संगठनों आईएसआईएस और बोको हराम जैसा है.”

इसी लाइन पर सारा विवाद है.

किताब के लॉन्च के साथ ही सलमान ख़ुर्शीद बीजेपी के निशाने पर हैं. लेकिन इस पूरे मुद्दे पर घमासान कांग्रेस के भीतर भी शुरू हो गया है.

इमेज स्रोत, Twitter/Salman Khurshid

राहुल गांधी और ग़ुलाम नबी आज़ाद के बयान

गुरुवार को कांग्रेस के एक दूसरे वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने इस मुद्दे पर ख़ुल कर अपनी असहमति जताई है और हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस या जिहादी इस्लाम से करने को अतिशयोक्ति बताया है.

ग़ुलाम नबी आज़ाद ने ट्वीट किया, “सलमान ख़ुर्शीद अपनी नई किताब में भले ही हम हिंदुत्व को हिंदू धर्म की मिलीजुली संस्कृति से अलग एक राजनीतिक विचारधारा मानकर इससे असहमति जताएँ. लेकिन हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और जिहादी इस्लाम से करना तथ्यात्मक रूप से ग़लत और अतिशयोक्ति है.”

यहाँ दो बातें अहम हो जाती है.

पहली ये कि ग़ुलाम नबी आज़ाद जम्मू-कश्मीर से आते हैं जो मुस्लिम बहुल है. पूर्व में वो G-23 गुट का प्रतिनिधित्व करते दिखे हैं, जो कथित तौर पर कांग्रेस नेतृत्व के ख़िलाफ़ बाग़ी तेवर अपनाए हुए है. और दूसरी तरफ़ सलमान ख़ुर्शीद दूसरे खेमे से ताल्लुक़ रखते हैं.

राहुल गांधी के ताज़ा बयान के बाद ये विवाद कांग्रेस के भीतर और गहरा गया है.

दूसरी अहम बात ये कि किताब अयोध्या पर है और ‘हिंदुत्व’ की बात करने वाले दोनों नेता मुसलमान हैं, इस वजह से दोनों की बातों के विरोधाभास को कांग्रेस की दुविधा से जोड़ कर देखा जा रहा. इसी दुविधा का ज़िक्र शुक्रवार को स्मृति ईरानी ने भी किया.

स्मृति ईरानी का बयान

शुक्रवार को केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने एक निजी टेलीविज़न चैनल को दिए इंटरव्यू के दौरान कहा कि सलमान ख़ुर्शीद ने किताब में जो लिखा, उसे पढ़ कर उन्हें आश्चर्य नहीं हुआ. डेढ़ दशक पहले उन्होंने अपनी दूसरी किताब में 1984 के दंगों पर लिखा था कि हिंदुओं और सिखों के साथ जो हुआ, उसमें दोनों ने बँटवारे के पापों की सज़ा भोगी है.

“अगर आप वो पढ़ लें तो सलमान ख़ुर्शीद ने अब जो लिखा, उस पर आपको आश्चर्य नहीं हुआ होगा.”

“आश्चर्य इस बात पर होना चाहिए कि वो लोग जो चुनाव आते ही मंदिर-मंदिर घूमते हैं, वो कम से कम ये बता दें कि क्या वो वाक़िफ़ हैं कि सलमान साहब ने हिंदुओं और सिखों के लिए क्या कहा था. नए नए हिंदू बने नेता बस इतना बता दें, उनकी बड़ी कृपा होगी.”

स्मृति ईरानी ने नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की तरफ़ है.

‘हिंदुत्व’ बनाम ‘सेक्युलरिज़्म’

एक ही विषय है ‘हिंदुत्व’. कांग्रेस के तीन बड़े नेता है- सलमान ख़ुर्शीद, ग़ुलाम नबी आज़ाद और राहुल गांधी.

तीनों की पार्टी एक है, विचारधारा एक है- लेकिन एक मसले पर विचार अलग क्यों हैं?

इस पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, “कांग्रेस अब पार्टी नहीं है, बस नेताओं की एक ‘झुंड’ बन कर रह गई है. अब कोई ‘सूत्रधार’ नहीं है जो पार्टी को एकजुट रखने का काम करे. कोई नेतृत्व नहीं है जो सबको स्वीकार्य हो. पिछले तीन साल से पार्टी नेतृत्व ही तय नहीं कर पाई है. पार्टी अपनी विचारधारा को लेकर आज भी क्लियर नहीं है. ऐसे में नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व के बाद इस चुनौती का कैसे सामना किया जाए, ये कोई नहीं समझ पा रहा.”

नीरजा आगे कहती हैं, “दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस आज सेक्युलरिज़्म पर बात नहीं कर रही है. वो मुद्दा तो पीछे छूट गया है. आज कांग्रेस भी हिंदुत्व को परिभाषित करने की होड़ में लग गई है.”

“किसी विचारधारा से सहमत और असहमत होना एक बात है, लेकिन आईएसआईएस और बोको हराम जैसे संगठनों से हिंदुत्व की तुलना अलग बात है. किताब में इस बात का ज़िक्र नहीं मिलता कि इस तुलना के पीछे का आधार क्या है?”

इस वजह से नीरजा इसके पीछे किताब की पब्लिसिटी को भी एक वजह मानती है.

शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी सलमान ख़ुर्शीद पर निशाना साधते हुए इसी तरफ़ इशारा किया है.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि ये हिंदू धर्म का अपमान है और इससे किताब को पब्लिसिटी तो मिल जाएगी, लेकिन करोड़ हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ आहत हो जाएँगी.

ये वही प्रियंका चतुर्वेदी हैं, जो पहले कांग्रेस में हुआ करती थीं और अब शिवसेना से राज्यसभा सांसद है.

और शिवसेना वही पार्टी है जो हिंदुत्व के मुद्दे पर महाराष्ट्र में सत्ता में बीजेपी के साथ हुआ करती थी और आज कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिल कर वहाँ सरकार चला रही है.

कांग्रेस पार्टी को कवर करने वाले कई पत्रकार मानते हैं कि ‘हिंदुत्व पर पार्टी की दुविधा’ उस वक़्त भी साफ़ दिखाई देती है, जब अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों के साथ राज्यों के चुनाव में गठबंधन कर लेती है.

कभी चुनाव पूर्व और कभी चुनाव के बाद.

महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शिवसेना के साथ गठबंधन चुनाव के बाद किया लेकिन एक उदाहरण पश्चिम बंगाल का है जहाँ अब्बास सिद्दीक़ी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट से चुनाव पूर्व गठबंधन किया था. फिर भी पार्टी का प्रदर्शन चुनाव में अच्छा नहीं रहा. असम में ये विरोधाभास देखने को मिला था, जिस पर पार्टी के भीतर से ही कई आवाज़ें निकली थी.

2014 के बाद की कांग्रेस

कांग्रेस को राजनीतिक दल के तौर पर सालों से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार औरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं, “2014 के बाद से कांग्रेस लगातार ‘कन्फ्यूजन’ वाली स्थिति में चल रही है. उन्हें अब तक समझ नहीं आ रहा कि उन्हें हिंदुत्व पर क्या लाइन लेनी चाहिए.”

इसके कई उदाहरण भी उन्होंने गिनाए.

“2014 के लोकसभा चुनाव में हुई हार की समीक्षा के लिए कांग्रेस ने एके एंटनी की अध्यक्षता एक कमेटी गठित की थी. एंटनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा था कि कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह ये थी कि पार्टी ‘मुसलमानों का तुष्टिकरण’ करते हुए दिखी, जिसकी वजह से हिंदुओं का बड़ा तबका पार्टी से नाराज़ दिखा. एंटनी कमेटी की रिपोर्ट का ही असर था कि 2014 की हार के बाद कांग्रेस ‘सॉफ़्ट हिंदुत्व कार्ड’ खेलती नज़र आई.”

“गुजरात और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पहले राहुल गांधी ने इस दिशा में कुछ सक्रियता दिखाई. कभी वो जनेऊ धारण करते दिखे तो कभी मंदिरों में पूजा पाठ करते दिखे. अब उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले प्रियंका गांधी भी मंदिर दर्शन करते हुए दिख रही है.”

“बाबरी मस्जिद पर फ़ैसले के बाद भी पार्टी ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मंदिर निर्माण का श्रेय लेने की कोशिश भी की. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि राम मंदिर का शिलान्यास पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने पहले ही कर दिया था. हाल में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की जो बैठक हुई उसके प्रस्ताव में एक लाइन थी ‘अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले के विरोध में पार्टी लड़ती रहेगी’ पार्टी ने चर्चा के बाद इस लाइन को प्रस्ताव में जोड़ा.”

ये वो तमाम उदाहरण है जिससे साफ़ जाहिर होता है कि कांग्रेस पार्टी को पता ही नहीं कि उन्हें क्या लाइन लेनी है.

2014 के पहली की दुविधा

दूसरी ओर नीरजा चौधरी कहती हैं कि हिंदुत्व को लेकर कांग्रेस में दुविधा पहले से भी रही है. लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ये और ख़ुल कर सामने दिखने लगा.

जब 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित स्थल के पास बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, उस वक़्त देश के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे.

कांग्रेस पर नज़र रखने वाले जानकारों का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ अंदर ही अंदर विरोध शुरू हो गया था. कांग्रेस के कुछ तत्कालीन नेताओं को लगता था कि नरसिम्हा राव उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाकर इस स्थिति से निपट सकते थे. लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया.

बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद नरसिम्हा राव ने अंतर्विरोध के चलते जल्दबाज़ी में ये घोषणा कर दी कि सरकार टूटे हुए ढाँचे की मरम्मत कर देगी.

हालाँकि मंदिर का ताला खुलवाने में राजीव गाँधी की भूमिका होने की बात भी सामने आती है.

उत्तर प्रदेश चुनाव में असर

पूरी बहस अयोध्या से शुरू होकर, हिंदुत्व तक पहुँच गई है, लिहाजा उत्तर प्रदेश चुनाव इससे अछूता कैसे रह सकता है.

कुछ जानकार इस पूरे विवाद को आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देख रहे हैं.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण ने एक ऐसा ट्वीट किया है जिसका सार है कि इस मुद्दे का फ़ायदा आने वाले यूपी चुनाव में बीजेपी को होगा.

नीरजा कहती हैं, बीजेपी को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया. महँगाई, रोज़गार की मुद्दा तो अब गौण हो जाएँगे. कोरोना में क्या किया क्या नहीं अब ये कोई नहीं पूछेगा.

हालाँकि वो ये भी मानती है कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष इस वक़्त बहुत बिखरा हुआ है और कांग्रेस बहुत बड़ी प्लेयर के तौर पर दिखाई नहीं पड़ती.

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Alex V Dare

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